मैं रात सी ढलती रही

 


वो चांद सा बढ़ता रहा मैं रात सी ढलती रही

वो हिज़्र का दरिया रहा मैं बेतहाशा बहती रही

वो ना दिल में था ना जुबां पे था ना जाने फिर भी मै

उसे देख के जीती रही उसे देख के मरती रही


वो जो था कभी अब क्यों नहीं और जो अब है वो तब नहीं

ये क्या बिसात ए जिंदगी मेरे साथ दगा करती रही


कभी हम नहीं कभी तुम नहीं कभी दौर ए वफ़ा नहीं मिली

अब किसको किसको दोष दू मै खुद ही सब सहती रही


ये तो युंही हुआ जो उसने कहा कल रात मेरे ख्वाब में

मुझे नींद भी ना आयी थी और देर तक सोती रही


उसका आना जाना था मेरे दिल के मकान में

वो बस किरायेदार था मै जिसका घर करती रही


उसने कभी जिक्र तो मेरा किया ना था किसीके सामने

और मैं थी उसे हर कदम हमराज अपना करती रही

 

ये भी यकीं है मुझे वो प्यार तो करता बहुत 

जो बात उसे बतानी थी वो खुद से ही  कहती रही


वो चला गया मुझे छोड़कर और मैं खड़ी तकती रही

मैंने कहा रोक लू और खुद  ही ना  कहती रही


वो ना आएगा अब बुलाने से इतना तो मुझे पता ही है

 फिर आज  दिल से अपने ही मै  आरजू करती रही


थे दायरे वफाओं के भी कुछ हद थी मेरे प्यार कि

की आज तक मै बैठकर इंतजार करती रही


अब हो चली है उम्र भी रहने दो उसका नाम ना लो

जो तार थे सितार के उन्हें छेड़ के रोती रही


जो बदल गया मदहोश वो लम्हा कहा से आएगा

वो चला गया मुझे भूल कर उसे याद मै करती रही

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