किताब की तरह

 वो जो पढ़ लेते है चेहरे को मेरे किताब की तरह

मिलते हैं मगर हमसे खुद माहताब की तरह

शामिल जो हुआ खून में इश्क़ मेरे शराब की तरह

चेहरा नज़र आया मुझे गुलाब की तरह


ये तो नहीं इश्क़ ही लिखता हूं मैं हमेशा

जब भी लिखता हूं इश्क़ हो जाता हैं सवाब की तरह


आईना देख के लगने लगा हैं यूं हमको

पसे आईना तुम हो किसी ख़्वाब की तरह


रंग कैसे मैं करू अपने चहरे का नियाज़

तुम नजर आओ मुझे शाम ए आफताब की तरह


क्या हैं दरमियान तेरे और मेरे इक भरोसे के सिवा

जो रखता है तुम्हें छुपाकर हिजाब की तरह


ईमान तो हैं जो अक्सर रोक लेता हैं कदमों को मेरे

दिल तो मचल जाता है बेईमान की तरह


हमसे मिलो बाते करो बैठो कभी साथ में

ये क्या हुआ की आए गए हो जाते हो जनाब की तरह


अब मदहोशी मदहोश की ना कुछ काम आएगी

तुम चढ़ गए हो नजरों में शराब की तरह



टिप्पणियाँ

  1. गजल एक छंद विधा है। उसमें सब कुछ नपा तुला होता है। इसलिए यदि थोड़ा भी इधर उधर होता है तो वह गज़ल नहीं रहती है। आपकी यह रचना गजल नहीं है लेकिन एक रचना है। गजल के लिए बहर, मीटर, रदीफ़, काफिया इन सब बातों का ध्यान रखा जाता है। फिर भी एक अच्छी कोशिश है, बधाई। लिखते रहिए धीरे धीरे सुधार और निखार आता जाएगा।

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    1. धन्यवाद बहुत बहुत
      इसीलिए आपसे अनुरोध किया
      मैं कोशिश करूंगा

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