ये ग़ज़ल तुम्हारे नाम की

 

ये ग़ज़ल तुम्हारे नाम की मैं गुनगुनाता जाऊंगा
मुझे याद तुम ना रहो पर भूल मैं ना पाऊंगा
तुम्हे डर है कि मैं भुला ना दू कही छोड़ ना दूं मैं राह में
हर मोड़ पे ए जिंदगी खड़ा हुआ मैं पाऊंगा।

कभी दोस्तों की भीड़ में तुम अगर गुम रहो
जो  तुम ना दोगे साथ तो मैं फिर कहां जाऊंगा

यूंही चलते चलते राह में एक रोज़ तुमने कहा तो था
तेरा हमनशीं कोई और हैं मैं अब किसे बुलाऊंगा

ये मुहब्बतों का जो खेल है इसे जीतकर या हारकर
तुम्हें पाना है मेरी जिंदगी और एक दिन तुझे पाऊंगा

ना हो हौसला तो क्यों न हो मुझे तुझ पे ये एतबार है
जो कल अगर मैं ना रहा तुझे याद बहुत मैं आऊंगा

तूने  बनाया था मुझे और अब तू ही मुझे मिटाएगा
मैं कहां बाकी रहा जो खुद को मैं सताऊंगा

रूठ जाना तेरी भी है मेरी भी है आदत तो क्या
कभी यूं न रूठ जाना के मैं बिल्कुल ही टूट जाऊंगा

कोई दर्द से दर्द का रिश्ता भी होता है क्या
तेरा दर्द जो मुझे मिल जाए तो फिर तुझे बताऊंगा

देर करदी बहुत तुमने आने में मेरे रूबरू
अब यूं करो की देर तक तुमको जी भर चाहूंगा

देखो मेरी नजरों में है ये सब नज़ारे तेरे लिए
तू आके जब भी देख ले दिल खोल तुझे दिखाऊंगा

अब सिलसिला जो नया बना उसे तुम निभा भी पाओगे
कहीं ये न हो के गीत ये मैं तन्हा ही गुनगुनाऊंगा

जब भी निकला हैं होटों से तेरे मेरा नाम आहिस्ता निकला
और गूंज इस कदर उठी के दूर तक सुन जाऊंगा

तुम मिले और यूं मिले मुझको एक बरसात में
तन क्या मन क्या रुह तक भीग जाऊंगा

चेहरा बयां कर देता है मदहोश  दिल का सब हाल उनको
कोई बात इस दिल की कैसे अब मैं छुपाऊंगा

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